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सिमरन सोधी की FCC में वापसी, दिल्ली कोर्ट के फैसले से चुनावी घमासान तेज!

अदालत ने बताया निष्कासन अवैध, चुनावों से पहले विदेशी संवाददाता क्लब में बढ़ी तनातनी

नई दिल्ली, 22 मार्च 2025दिल्ली की अदालत ने वरिष्ठ पत्रकार सिमरन सोधी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें विदेशी संवाददाता क्लब (FCC) से निष्कासन को अवैध करार दिया और उनकी सदस्यता बहाल कर दी। यह निर्णय ऐसे समय पर आया है जब FCC चुनावों को लेकर पहले से ही भारी गहमा-गहमी और कानूनी लड़ाई का सामना कर रहा है।

कोर्ट का बड़ा फैसला

जिला न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने अपने आदेश में कहा कि 15 अक्टूबर 2024 को जारी निष्कासन पत्र FCC के बायलॉज के अनुरूप नहीं था। क्लब के नियमों के तहत गवर्निंग कमेटी के प्रस्ताव के बिना किसी सदस्य को निष्कासित नहीं किया जा सकता, जो इस मामले में नहीं हुआ।

“एक प्रतिष्ठित संगठन के वरिष्ठ सदस्य आपसी मतभेद सुलझाने के बजाय खुले कोर्ट में कीचड़ उछाल रहे हैं,”
— अदालत ने अपने आदेश में यह तीखी टिप्पणी की।

वकील सुनीता भारद्वाज पर उठे सवाल

सुनवाई के दौरान, सिमरन सोधी ने प्रतिवादी पक्ष की वकील सुनीता भारद्वाज पर हितों के टकराव (Conflict of Interest) का आरोप लगाया। उन्होंने कोर्ट में बताया कि सुनीता भारद्वाज पहले उन्हें एक मानहानि मामले में रिप्रेजेंट कर चुकी हैं और उनके निजी संवादों की जानकारी रखती हैं।

अदालत ने इस आरोप को गंभीरता से लिया और कहा कि यदि यह मामला बार काउंसिल ऑफ इंडिया की आचार संहिता का उल्लंघन करता है, तो वादी वहां शिकायत दर्ज करा सकती हैं।

पूरा विवाद क्या है?

  • 4 अक्टूबर 2024: सिमरन सोधी और अन्य GC सदस्यों ने अध्यक्ष एस. वेंकट नारायण के खिलाफ नो-कॉन्फिडेंस मोशन पास किया और खुद को अंतरिम अध्यक्ष घोषित किया।

  • 8 अक्टूबर 2024: उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजा गया।

  • 15 अक्टूबर 2024: बिना किसी सुनवाई और प्रस्ताव के, उन्हें FCC से निष्कासित कर दिया गया।

अदालत ने क्या कहा?

अदालत ने FCC के नियम 4(i) और 4(j) का हवाला देते हुए कहा कि गवर्निंग कमेटी ही निष्कासन का निर्णय ले सकती है, और निष्कासन से पहले सदस्य को सुनवाई का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

“इस मामले में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं था, न ही कोई सुनवाई हुई। इसलिए निष्कासन आदेश कानूनन अवैध है।”
— न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा

चुनावों पर असर

सिमरन सोधी ने कोर्ट को बताया कि 17 मार्च 2025 को जारी वोटर लिस्ट में उनका नाम जानबूझकर हटाया गया, जबकि उनकी सदस्यता पर कोर्ट में मामला लंबित था।

हालांकि, अदालत ने चुनाव अधिकारी पर कोई सीधा आदेश नहीं दिया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि ऐसी प्रक्रियाएं अनुचित हैं।

क्या पत्रकारिता का लोकतंत्र खतरे में?

FCC, जो पत्रकारिता जगत में एक प्रतिष्ठित संस्था मानी जाती है, अब अंदरूनी कलह और अदालती मामलों से घिरी हुई है। यह मामला सिर्फ एक क्लब विवाद नहीं, बल्कि पत्रकारिता में लोकतंत्र, पारदर्शिता और कानूनी जवाबदेही की अहमियत को दर्शाता है।

क्या यह विवाद FCC के आगामी चुनावों को और प्रभावित करेगा? यह देखना दिलचस्प होगा।

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