Uttarakhand

स्थगित हुई नंदा देवी राजजात यात्रा, अब 2027 में होगी आयोजन — समिति ने लिया औपचारिक निर्णय

उच्च हिमालय में सुरक्षा जोखिमों और परंपरागत चक्र को ध्यान में रखते हुए निर्णय, यात्रा के लिए कुंभ की तर्ज पर प्राधिकरण और 5,000 करोड़ रुपये बजट की मांग

उत्तराखंड की सबसे प्राचीन, कठिन और पवित्र धार्मिक यात्राओं में गिनी जाने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा अब वर्ष 2027 में आयोजित की जाएगी। पहले यह यात्रा सितंबर 2026 में प्रस्तावित थी, लेकिन नंदा राजजात समिति ने औपचारिक निर्णय लेकर इसे उसके परंपरागत 12 वर्षीय चक्र के अनुरूप अगले वर्ष तक स्थगित कर दिया है।

समिति ने बताया कि सितंबर माह में हिमस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं के बढ़े जोखिम को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। पूर्व में भी इस अवधि में कई गंभीर घटनाएं सामने आ चुकी हैं। सुरक्षा और व्यवस्थाओं की दृष्टि से यात्रा की तिथि आगे बढ़ाना आवश्यक माना गया।

समिति ने कहा कि यात्रा की औपचारिक शुरुआत से जुड़ी मनौती आगामी वसंत पंचमी पर की जाएगी, जिसके बाद यात्रा की अंतिम तिथियों पर मुहर लगाई जाएगी।

नंदा राजजात समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय धार्मिक परंपराओं, पंचांग गणना, प्रशासनिक तैयारियों और यात्रा की व्यापकता को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित, सुव्यवस्थित और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध अनुभव प्राप्त हो सके।

इसके साथ ही समिति ने सरकार से कुंभ मेले की तर्ज पर “नंदा राजजात प्राधिकरण” गठित करने और लगभग ₹5,000 करोड़ के बजट की मांग की है, ताकि इस दिव्य यात्रा को प्रभावी और व्यवस्थित रूप से संपन्न कराया जा सके।


नंदा देवी राजजात यात्रा — आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्वितीय संगम

नंदा देवी राजजात यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकआस्था, सांस्कृतिक चेतना और पर्वतीय एकता की प्रतीक मानी जाती है। इसे हिमालय की सबसे लंबी और कठिन पैदल यात्राओं में गिना जाता है।

लोक मान्यता के अनुसार, यह यात्रा मां नंदा देवी को उनके मायके गढ़वाल से ससुराल होमकुंड तक विदा करने का प्रतीक है। मां नंदा देवी को भगवान शिव की अर्धांगिनी और हिमालय की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इतिहासकारों के अनुसार, नंदा राजजात का उल्लेख 8वीं–9वीं शताब्दी से मिलता है। कत्यूरी और गढ़वाल शासकों ने इसे राजकीय संरक्षण दिया।
इसे “राजजात” इसलिए कहा गया क्योंकि प्राचीन काल में राजा स्वयं इस यात्रा का नेतृत्व करते थे। यह यात्रा गढ़वाल और कुमाऊं की साझा सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक है जिसने सदियों से पर्वतीय समाज को एक सूत्र में बाँधा है।


चार सींग वाला भेड़ा — यात्रा की विशिष्ट पहचान

इस यात्रा की सबसे अनोखी परंपरा चार सींग वाले दुर्लभ भेड़े (खाडू) से जुड़ी है। मान्यता है कि जब भी ऐसा भेड़ा जन्म लेता है, तभी राजजात यात्रा का आयोजन निश्चित हो जाता है। यह भेड़ा यात्रा का अग्रदूत होता है और मां नंदा देवी का प्रतीकात्मक प्रतिनिधि माना जाता है।


यात्रा मार्ग और प्रमुख पड़ाव

प्रारंभ स्थल: नौटी गांव, जिला चमोली
मुख्य पड़ाव: नौटी → इड़ा बधाणी → कासुंवा → कोटी → नंदकेसरी → थराली → वांण → बेदनी बुग्याल → रूपकुंड → शिलासमुद्र → होमकुंड

यात्रा अवधि: लगभग 22–25 दिन
कुल दूरी: करीब 280 किलोमीटर पैदल मार्ग
दुर्गम हिमालयी क्षेत्र, ऊंचे बुग्याल, बर्फीली चोटियाँ और कठिन मौसम इस यात्रा की चुनौती को परिभाषित करते हैं।


धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

धार्मिक रूप से यह यात्रा शिव-शक्ति परंपरा से जुड़ी हिमालयी लोकदेवताओं की सामूहिक उपासना का प्रतीक है।
सांस्कृतिक दृष्टि से यह यात्रा लोकगीतों, झोड़ा-छपेली, जागर, पारंपरिक वेशभूषा और सेवा भावना का जीवंत प्रदर्शन है। इसी कारण इसे उत्तराखंड की चलती-फिरती लोकसंस्कृति का संग्रहालय कहा जाता है।


सहभागिता और प्रशासनिक तैयारियाँ

पिछली नंदा राजजात (2014) में लगभग 20 लाख श्रद्धालु शामिल हुए थे। वर्ष 2027 की यात्रा में 30 से 50 लाख श्रद्धालुओं की सहभागिता का अनुमान है।
राज्य सरकार द्वारा यात्रा के दौरान —

  • सुरक्षा बलों की तैनाती
  • स्वास्थ्य शिविर और मोबाइल अस्पताल
  • सैटेलाइट फोन व संचार व्यवस्था
  • आपदा प्रबंधन योजना
  • ट्रैक सुधार और अस्थायी पुल निर्माण
  • पर्यावरण संरक्षण व प्लास्टिक प्रतिबंध
    जैसे सभी आवश्यक इंतजाम किए जाएंगे।

नंदा देवी राजजात यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का उत्सव है, बल्कि हिमालय की संस्कृति, लोकपरंपरा और सामूहिक श्रद्धा का प्रतीक है — जो उत्तराखंड की आत्मा में बसती है।

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