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ब्रेकिंग न्यूज़ : ज्योतिष शास्त्रार्थ में टकराए तीन मत, 2029 को लेकर बने तीखे दावे

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता

देश की राजनीति को लेकर एक बार फिर ज्योतिषीय भविष्यवाणियाँ चर्चा के केंद्र में आ गई हैं। तीन प्रमुख ज्योतिषाचार्यों के बीच हुए एक तीखे शास्त्रार्थ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक भविष्य को लेकर परस्पर विरोधी दावे सामने आए हैं। इस बहस ने 2029 के आम चुनावों से पहले राजनीतिक गलियारों में नई अटकलों को जन्म दे दिया है।

शास्त्रार्थ के दौरान ज्योतिष आचार्य श्रुति प्रिया जी ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी सत्ता से विदा लेने वाले नहीं हैं। उनके अनुसार आने वाले समय में मोदी उन राज्यों पर विशेष ध्यान देंगे जहाँ भारतीय जनता पार्टी अब तक अपनी सत्ता स्थापित नहीं कर पाई है। उन्होंने कहा कि “राजनीतिक विस्तार और संगठनात्मक मजबूती का दौर अभी शेष है।”

वहीं ज्योतिष आचार्य पुरुषोत्तम मिश्रा जी ने इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए भविष्यवाणी की कि नरेंद्र मोदी न केवल 2029 का लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, बल्कि उसमें विजयी होकर एक बार फिर भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे। उनके अनुसार ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति “दीर्घकालीन नेतृत्व” की ओर संकेत कर रही है।

हालांकि इन दोनों दावों के बिल्कुल विपरीत मत रखते हुए डॉ. राजा मिश्रा जी ने एक अलग ही तस्वीर प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी 2029 से पहले ही सक्रिय राजनीति से संन्यास ले सकते हैं। डॉ. मिश्रा के अनुसार मोदी की कुंडली वृश्चिक लग्न की है और 30 नवंबर 2028 से राहु महादशा/प्रभाव आरंभ होने जा रहा है, जो उनके लिए चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

डॉ. मिश्रा ने अपनी व्याख्या में कहा कि राहु का पंचम भाव में होना यश और छवि पर प्रभाव डाल सकता है। उनकी पंचम दृष्टि नवम भाव पर पड़ने से भाग्य का अपेक्षित सहयोग न मिलना, सप्तम दृष्टि एकादश भाव पर होने से इच्छाओं की पूर्ति में बाधा, तथा नवम दृष्टि प्रथम भाव पर होने से मानसिक दबाव और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ बढ़ने की संभावना जताई गई। उनके अनुसार इन परिस्थितियों के चलते प्रधानमंत्री सत्ता ही नहीं, बल्कि राजनीति से भी संन्यास लेकर आध्यात्मिक जीवन की ओर अग्रसर हो सकते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे में भारतीय जनता पार्टी से ही कोई नया, युवा चेहरा देश की बागडोर संभाल सकता है।

गौरतलब है कि ये सभी दावे ज्योतिषीय आकलन और व्यक्तिगत व्याख्याओं पर आधारित हैं। राजनीतिक भविष्य को लेकर अंतिम फैसला जनता और समय के हाथ में होता है। फिलहाल, इस शास्त्रार्थ ने 2029 के चुनावी परिदृश्य को लेकर बहस को और तेज कर दिया है, जिस पर देश की राजनीतिक निगाहें टिकी हुई हैं।

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