जल से विषैले प्लास्टिक प्रदूषकों को तेजी से हटाने के लिए आईआईटी रुड़की की नैनो-सक्षम सफलता
नैनोफॉस्फेट तकनीक से कुछ ही घंटों में जल से हटेंगे प्लास्टिक योजक; वैश्विक सततता मिशनों की दिशा में भारत का महत्वपूर्ण कदम
पीआईबी देहरादून | भारत सरकार | दिनांक: 13 जनवरी 2026
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने जल से विषैले प्लास्टिक प्रदूषकों (फ्थेलेट्स) को तेजी से हटाने के लिए एक नैनो-सक्षम नवाचार विकसित किया है। यह शोध भारत के सतत विकास मिशनों और जल एवं प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के वैश्विक प्रयासों के अनुरूप एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि मानी जा रही है।
आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने बहु-पोषक नैनोफॉस्फेट कण (multi-nutrient nanophosphates) तैयार किए हैं, जो सूक्ष्मजीवों के लिए पोषक भंडार का कार्य करते हैं। ये कण फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, कैल्शियम और सूक्ष्म धातुओं जैसे आवश्यक तत्वों को धीरे-धीरे और नियंत्रित रूप से मुक्त करते हैं — ठीक उसी समय जब जीवाणुओं को उनकी आवश्यकता होती है।
फ्थेलेट्स हटाने में अद्भुत सफलता
अंतरराष्ट्रीय जर्नल ACS ES&T Water में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने प्रदर्शित किया कि इन नैनोफॉस्फेट कणों की मदद से प्रदूषक-विघटन जीवाणु (Rhodococcus jostii RHA1) जल में मौजूद फ्थेलेट्स को केवल तीन घंटे के भीतर हटाने में सक्षम हैं।
यह तकनीक बिना किसी अतिरिक्त पोषक माध्यम के, यहां तक कि पोषक-तत्व-विहीन जल में भी प्रभावी सिद्ध हुई।
शोध में पाया गया कि नैनोफॉस्फेट जीवाणुओं को निरंतर पोषक आपूर्ति देते हैं, जिससे उनकी वृद्धि बिना विलंब के आरंभ हो जाती है। इससे फ्थेलेट्स जैसे अंतःस्रावी-विघ्नकारी रसायन, जो हार्मोन और प्रजनन तंत्र को प्रभावित करते हैं, प्रभावी रूप से विघटित हो जाते हैं।
पर्यावरण के अनुकूल और सतत तकनीक
आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तकनीक पारंपरिक उर्वरकों की तरह द्वितीयक प्रदूषण (secondary pollution) नहीं उत्पन्न करती। ये नैनोकण धीरे-धीरे घुलकर आवश्यक पोषक तत्वों की नियंत्रित आपूर्ति करते हैं, जिससे जल की गुणवत्ता पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।
रासायनिक विश्लेषण से यह भी पुष्टि हुई कि मैग्नीशियम जैसे तत्व जैव-विघटन के दौरान जीवाणुओं द्वारा उपभोग किए गए, जिससे यह साबित होता है कि नैनोफॉस्फेट कण वास्तव में जीवाणु गतिविधि को ऊर्जा और पोषण प्रदान कर रहे थे।
विभिन्न जल नमूनों पर सफल प्रयोग
यह विधि नल जल, नदी जल और कृत्रिम अपशिष्ट जल जैसे विभिन्न प्रकार के जल नमूनों में प्रभावी साबित हुई। सभी परिस्थितियों में जीवाणुओं ने उच्च सक्रियता बनाए रखी और विषैले यौगिकों को तेजी से विघटित किया।
जैव-पुनर्स्थापन के लिए नई दिशा
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक जैव-पुनर्स्थापन (bioremediation) के लिए एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण प्रदान करती है। पारंपरिक उर्वरकों की बाढ़ लाने के बजाय, ये अभिकल्पित पोषक नैनोकण लाभकारी सूक्ष्मजीवों को लक्षित और सीमित मात्रा में पोषण प्रदान करते हैं, जिससे लागत घटती है, प्रदूषण नहीं बढ़ता, और विश्वसनीयता बढ़ती है।
आईआईटी रुड़की का वक्तव्य
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर के. के. पंत ने कहा,
“यह अनुसंधान वैश्विक सततता चुनौतियों के लिए विज्ञान-आधारित समाधान विकसित करने की आईआईटी रुड़की की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह नवाचार न केवल भारत के वैज्ञानिक समुदाय के लिए गर्व का विषय है, बल्कि विश्व स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को भी नई दिशा देगा।”
स्रोत: प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), देहरादून
संस्थान: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की



