आईटी पार्क के नाम पर 18 लैपटॉप की ठगी, दो महीने बाद दर्ज हुई FIR; पुलिस की कार्यशैली पर उठे सवाल

देहरादून।
राजधानी देहरादून के आईटी पार्क क्षेत्र में फर्जी कॉर्पोरेट पहचान का इस्तेमाल कर लाखों रुपये की साइबर ठगी का मामला सामने आया है। आरोप है कि जालसाजों ने एक प्रतिष्ठित कंपनी का प्रतिनिधि बनकर 18 डेल लैपटॉप मंगवाए और करीब ₹4.50 लाख की ठगी को अंजाम दिया। पीड़ित की शिकायत के बावजूद पुलिस द्वारा करीब दो महीने बाद मुकदमा दर्ज किए जाने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं।
फर्जी कंपनी बनकर दिया ऑर्डर
सहस्त्रधारा रोड निवासी ललन कुमार ने पुलिस को दी शिकायत में बताया कि 14 मई 2026 को उनके पास एक फोन आया। कॉल करने वाले ने स्वयं को आईटी पार्क स्थित कंपनी का प्रतिनिधि बताते हुए 18 डेल लैपटॉप का ऑर्डर दिया। विश्वास दिलाने के लिए ई-मेल के माध्यम से फर्जी परचेज ऑर्डर भी भेजा गया।
ऑर्डर पर भरोसा करते हुए ललन कुमार ने लगभग ₹4.50 लाख मूल्य के लैपटॉप बताए गए पते पर भिजवा दिए। डिलीवरी के बाद भुगतान के लिए लगातार टालमटोल की जाती रही। कुछ दिनों बाद सभी मोबाइल नंबर बंद हो गए। जब पीड़ित बताए गए पते पर पहुंचा तो वहां न कोई कंपनी मिली और न ही संबंधित कर्मचारी।
दो महीने तक कार्रवाई नहीं
पीड़ित का आरोप है कि घटना के तुरंत बाद राजपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई गई थी, लेकिन पुलिस ने लंबे समय तक न तो एफआईआर दर्ज की और न ही कोई ठोस जांच शुरू की। उच्च अधिकारियों से शिकायत के बाद आखिरकार राजपुर थाने में धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पुलिस समय रहते कार्रवाई करती तो आरोपियों की गिरफ्तारी और लैपटॉप की बरामदगी की संभावना अधिक रहती। देरी के कारण अब साक्ष्य कमजोर होने और आरोपियों के फरार होने की आशंका बढ़ गई है।
जांच में जुटी पुलिस
राजपुर थाना प्रभारी पी.डी. भट्ट ने बताया कि शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पीड़ित से परचेज ऑर्डर, बिल और बातचीत में इस्तेमाल मोबाइल नंबर सहित अन्य दस्तावेज प्राप्त किए गए हैं। पुलिस सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की तलाश कर रही है।
व्यापारियों में बढ़ी चिंता
आईटी पार्क जैसे व्यावसायिक क्षेत्र में फर्जी कंपनियों के नाम पर सामान मंगवाकर ठगी की घटनाएं बढ़ने से कारोबारियों में चिंता का माहौल है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में त्वरित पुलिस कार्रवाई और कंपनियों की पहचान का डिजिटल सत्यापन ही इस तरह की धोखाधड़ी पर प्रभावी रोक लगा सकता है।



